एक फुलकी खुश्बु है - ऋचा जानी
Posted by સુરેશ on June 20, 2007
एक फुलकी खुश्बु है, गमभरी कहानी है।
न लीखी ये कीताबोमें, कीसी दीलकी जुबानी है ।
शाम होते सताती है, तेरी याद धुंआ बनके,
आंसुसे हुइ जो गीली तेरी याद जलानी है।
जग रंग बदलता है, कौन अपना पराया है,
अपनोंके हाथों पर मेरे खुनकी नीशानी है ।
न तो पुरा उजाला है, न तो पुरा अंधेरा है,
शायद है वो ही तो, वजह ये शाम सुहानी है ।
आसमां पर बीठाती है, तो कभी गमके अंधेरेमें,
अच्छा कीया कुदरतने, दो दीनकी जवानी है ।
हुइ क्या है खता मेरी कि, तुम इतने रुठ गये,
आज पुछती है राज तुम्हें, ये बात बतानी है।
घनघोर अंधेरा है, कोइ राह नहीं दीखती,
कल होगा सवेरा, फिर ये आस टीकानी है !
- ऋचा जानी
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