एक फुलकी खुश्बु है, गमभरी कहानी है।
न लीखी ये कीताबोमें, कीसी दीलकी जुबानी है ।
शाम होते सताती है, तेरी याद धुंआ बनके,
आंसुसे हुइ जो गीली तेरी याद जलानी है।
जग रंग बदलता है, कौन अपना पराया है,
अपनोंके हाथों पर मेरे खुनकी नीशानी है ।
न तो पुरा उजाला है, न तो पुरा अंधेरा है,
शायद है वो ही तो, वजह ये शाम सुहानी है ।
आसमां पर बीठाती है, तो कभी गमके अंधेरेमें,
अच्छा कीया कुदरतने, दो दीनकी जवानी है ।
हुइ क्या है खता मेरी कि, तुम इतने रुठ गये,
आज पुछती है राज तुम्हें, ये बात बतानी है।
घनघोर अंधेरा है, कोइ राह नहीं दीखती,
कल होगा सवेरा, फिर ये आस टीकानी है !
- ऋचा जानी
June 20, 2007 at 7:28 pm
સુરેશભાઈ,
આ વાત તો આજે જ જાણી ! ઋચાબેન આટલી સશક્ત રચના આપે છે, આજ જાણ્યું ! અભીનંદન તમને પણ. દાદા, દોહીત્ર અને હવે બંનેની વચ્ચે મા-દીકરી; સૌને સ્વાગતમ્ !!
June 20, 2007 at 8:41 pm
बढीया गझल हैँ। मेरी शुभकामना है, बस अच्छा लीखती रहो ।
June 20, 2007 at 8:47 pm
Wow !
How old is Ruchaji-? where did she learn Hindi–This is not Hindi cinema language- A literary piece-
Congratulations ! I have my limitation in typing so I ‘ll just stop-Otherwise we can discuss the whole poem—Keep it up-
June 20, 2007 at 10:41 pm
સુંદર રચના છે.
June 20, 2007 at 11:46 pm
सुंदर कविता लिखी है:)
June 21, 2007 at 12:06 am
સુંદર ગઝલ…. હરનિશભાઈનો પ્રશ્ન એ મારો પણ પ્રશ્ન છે? ઋચાની ઊંમર કેટલી? ગઝલની ભાષા અને સાફબયાની ઊડીને આંખે વળગે છે…. અભિનંદન, ઋચા ! મોરના ઈંડા વાળી કહેવત જાની પરિવારને જોઈને જ બની હશે? ફરીથી અભિનંદન…
June 21, 2007 at 12:36 am
आसमां पर बीठाती है, तो कभी गमके अंधेरेमें,
अच्छा कीया कुदरतने, दो दीनकी जवानी है ।
gud sher….
keep it up… gr8 going…
June 21, 2007 at 1:01 am
heartly congrats to ruchaji…! really its very good…! keep it up..!
June 21, 2007 at 1:35 am
आसमां पर बिठाती है, तो कभी गमके अंधेरेमें,
अच्छा किया कुदरत ने, दो दिन की जवानी है ।
स्वागत है आपका ऋचा, सुंदर कविता है
June 21, 2007 at 1:59 am
अच्छी कविता है । लिखते रहिये
June 21, 2007 at 3:10 am
सुंदर कविता!!
शुभकामनाएं
June 21, 2007 at 3:13 am
न तो पुरा उजाला है, न तो पुरा अंधेरा है,
शायद है वो ही तो, वजह ये शाम सुहानी है
।मजा आ गया,सब से खूबसूरत तो यही गौधूली की बेला होती है बह्त अच्छी कविता
June 21, 2007 at 5:16 am
very nice
June 21, 2007 at 6:10 am
It is unique that poetry is woven in the family fabrik.
I am not a man of poetry, but I mejoyed your creation.
Rucha, keep it going.
RATIBHAI
June 21, 2007 at 12:26 pm
बहुत सुंदर रचना, आशा है कि आगे भी आपको पढ़ने के अवसर प्राप्त होते रहेंगे।
June 22, 2007 at 3:25 pm
Really nice poem Ruchaben! Love to hear more…
July 3, 2007 at 6:17 pm
“दो दीनकी जवानी है ।” कुच्छ अच्छी कविता ही होजायें दिल बहाने की।
December 19, 2007 at 10:07 am
Beautiful poem, Rucha!
I did not know you write in Hindi also.
Keep up the good work!