क्या यही मेरा जीवन ? – राजेन्द्र त्रीवेदी

सुबहसे श्याम, श्याम से रात,
और रातसे फीर सुबह तक?

पानीके फंवारेसे भीगके, युं भागे पेट भरने ।
बीवीको बाय करके, सबवे मेँ ओफीस जाने ।

साहीबकी करते सेवा,  डोलर बहुत बनाने ।
फास्ट फुड अकेले खाके, शाम होते घरको आने।

बीवीसे बोलनेका, टाइम भी तो कम है,
सोनेके साथ सुबहाकी, बस आस अब नहीं है ।

अब प्यारकी ही  प्यासमें,  यह साँस भी तो कम है।
ये होठ भी सुखे हैं , सब बात रहती मनमें ।

क्या बस यही है जीवन, जीने का एक मकसद ?
या कुछ करके मन रिझाने ,  सब साथ प्यार बाँटे ? 

राजेन्द्र त्रीवेदी

जनाब! अब तो आप उर्दु शायर भी हो चुके !

One Response to “क्या यही मेरा जीवन ? – राजेन्द्र त्रीवेदी”

  1. pragnaju Says:

    जनाबे आली,
    वाह्
    आपकी शायरीको दाद देते हुए -
    आपने न केवल हमारी सुबहसे शाम तकक़ी दांस्तां
    किन्तु
    शामसे सुबह तककी दास्तां हुबहु बताई.
    और मकसद -
    ” सब साथ प्यार बाँटे”बताके
    हमारे मनकी बात छीन ली .
    राजेन्द्र त्रीवेदीजी धन्यवाद


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