क्या यही मेरा जीवन ? - राजेन्द्र त्रीवेदी
Posted by સુરેશ on September 24, 2007
सुबहसे श्याम, श्याम से रात,
और रातसे फीर सुबह तक?
पानीके फंवारेसे भीगके, युं भागे पेट भरने ।
बीवीको बाय करके, सबवे मेँ ओफीस जाने ।
साहीबकी करते सेवा, डोलर बहुत बनाने ।
फास्ट फुड अकेले खाके, शाम होते घरको आने।
बीवीसे बोलनेका, टाइम भी तो कम है,
सोनेके साथ सुबहाकी, बस आस अब नहीं है ।
अब प्यारकी ही प्यासमें, यह साँस भी तो कम है।
ये होठ भी सुखे हैं , सब बात रहती मनमें ।
क्या बस यही है जीवन, जीने का एक मकसद ?
या कुछ करके मन रिझाने , सब साथ प्यार बाँटे ?
- राजेन्द्र त्रीवेदी
जनाब! अब तो आप उर्दु शायर भी हो चुके !
September 26, 2007 at 8:42 am
जनाबे आली,
वाह्
आपकी शायरीको दाद देते हुए -
आपने न केवल हमारी सुबहसे शाम तकक़ी दांस्तां
किन्तु
शामसे सुबह तककी दास्तां हुबहु बताई.
और मकसद -
” सब साथ प्यार बाँटे”बताके
हमारे मनकी बात छीन ली .
राजेन्द्र त्रीवेदीजी धन्यवाद